जो कभी धूम्रपान नहीं करते उन्हें भी फेफड़े का कैंसर, ब्रिटेन में हर साल होती हैं छह हजार मौतें : खोज

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लंदन
‘द लैंसेट ऑन्कोलॉजी’ ने फ्रांसिस क्रिक के अध्ययन को ‘एक बड़ी खोज’ बताया है। स्वैनटन ने कहा, कैंसर पैदा करने वाले म्यूटेशन वाली कोशिकाएं हमारी उम्र के अनुसार स्वाभाविक रूप से जमा होती रहती हैं, लेकिन वे सामान्य रूप से निष्क्रिय होती हैं।

जो लोग कभी धूम्रपान नहीं करते, उन्हें भी फेफड़े का कैंसर हो सकता है। लंदन में फ्रांसिस क्रिक इंस्टीट्यूट के रिसर्चर्स ने अपने अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ है कि फेफड़े के कैंसर के लिए वायु प्रदूषण भी अहम कारण है। अध्ययन में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि 2019 में दुनिया भर में तीन लाख से ज्यादा फेफड़ों के कैंसर से होने वाली मौतों का कारण वायु प्रदूषण था। अभी तक के अध्ययनों में केवल धूम्रपान को ही फेफड़ों के कैंसर का कारण माना जा रहा था।

40 हजार लोगों पर किए गए शोध में वैज्ञानिकों ने कहा कि हवा में मौजूद 2.5 माइक्रोमीटर सांस लेने के साथ अंदर जाने वाले प्रदूषण के कण होते हैं। यह 70 फीसदी से ज्यादा मामलों के लिए फेफड़ों में सूजन के लिए जिम्मेदार है। जो आमतौर पर कैंसर वाले म्यूटेशन को ले जाने वाली निष्क्रिय कोशिकाओं को सक्रिय होने का कारण होता है। पीएम 2.5 के कारण होने वाली सूजन के साथ इन कोशिकाओं के प्रसार से ट्यूमर बन सकता है।

ब्रिटेन में हर साल छह हजार लोग कैंसर से मर जाते हैं, इनमें सबसे अधिक वह होते हैं जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया। ये निष्कर्ष यूरोपियन सोसाइटी ऑफ मेडिकल ऑन्कोलॉजी (ईएसएमओ) कांग्रेस में प्रोफेसर चार्ल्स स्वैनटन, प्रमुख शोधकर्ता और कैंसर दवा विशेषज्ञ द्वारा प्रस्तुत किए गए थे। ईएसएमओ ऑन्कोलॉजिस्ट का एक प्रमुख प्रोफेशनल ऑर्गेनाइजेशन है।

कई भारतीय शहर खासतौर पर दिल्ली सहित गंगा के बाढ़ के मैदानों वाले शहर कई सालों से वायु प्रदूषण के उच्च स्तर से जूझ रहे हैं। 2020 में द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ में प्रकाशित एक विश्लेषण ने अनुमान लगाया कि 2019 में भारत में 16.7 करोड़ मौतें वायु प्रदूषण के कारण हुईं। यह देश में सभी मौतों का लगभग 17.8 प्रतिशत था।

फ्रांसिस क्रिक इंस्टीट्यूट के बयान के मुताबिक, हालांकि धूम्रपान फेफड़ों के कैंसर के लिए सबसे बड़ा जोखिम कारक बना हुआ है। इसके बावजूद ब्रिटेन में फेफड़ों के कैंसर के 10 में से एक मामले में बाहरी वायु प्रदूषण जिम्मेदार होता है। को-फर्स्ट ऑथर डॉ एमिलिया लिम ने एक बयान में कहा, हमारे विश्लेषण के मुताबिक, वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ने से फेफड़ों के कैंसर, मेसोथेलियोमा और मुंह और गले के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।

‘द लैंसेट ऑन्कोलॉजी’ ने फ्रांसिस क्रिक के अध्ययन को ‘एक बड़ी खोज’ बताया है। स्वैनटन ने कहा, कैंसर पैदा करने वाले म्यूटेशन वाली कोशिकाएं हमारी उम्र के अनुसार स्वाभाविक रूप से जमा होती रहती हैं, लेकिन वे सामान्य रूप से निष्क्रिय होती हैं। हमने पाया कि वायु प्रदूषण फेफड़ों में इन कोशिकाओं को जगाता है, उन्हें बढ़ने और संभावित रूप से ट्यूमर बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है।

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